एक गुप्त सत्य · रामायण से।
श्री राम और हनुमान जी सगे भाई हैं।
दोनों एक ही पुत्र-कामेष्टि यज्ञ की पायस से जन्मे — दोनों भगवान विष्णु के अंश।
माँ कामाख्या, आपके चरणों में प्रणाम।
आज्ञा माँगता हूँ — हनुमान जी की एक सच्ची, अनसुनी कथा सुनाने की। जो रामायण से जुड़ी है, स्कन्द पुराण में सुरक्षित है, परंतु लोग नहीं जानते। आपकी कृपा से कथा प्रकट होगी।
यह कथा वो है जो हनुमान जी ने स्वयं हिमालय के पत्थरों पर अपनी पूँछ की कलम से लिखी थी — और बाद में समुद्र में बहा दी थी, ताकि वाल्मीकि जी की कीर्ति बनी रहे।
जो स्कन्द पुराण और आनंद रामायण में बच गई — वही माँ के चरणों में रखता हूँ।
दोनों भगवान विष्णु के अंश हैं।
राजा दशरथ अयोध्या के सम्राट थे, पर उनकी कोई संतान नहीं थी। महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करने का आदेश दिया। यज्ञ-कुंड के बीच से अग्निदेव स्वयं प्रकट हुए — हाथों में एक स्वर्ण-पात्र, जिसमें दिव्य खीर (पायस) थी। उन्होंने कहा —
राजा ने वह पायस अपनी तीन रानियों — कौसल्या · कैकेयी · सुमित्रा — को बाँटना शुरू किया। परंतु यहाँ एक रहस्य है, माँ।
जब पायस बाँटा जा रहा था, एक विशाल चील आकाश से नीचे उतरी। (कुछ कथाओं में यह वायुदेव का स्वरूप कहलाती है, कुछ में काकभुशुण्ड-रूप।) उसने अपनी चोंच में पायस का एक छोटा सा अंश उठाया — और आकाश में उड़ गई।
वह चील बहुत दूर तक उड़ी — हिमालय के पास पम्पासर वन तक। उस वन में, उस समय अंजना देवी — एक तपस्विनी — अपने पुत्र की कामना से ध्यानमग्न थीं। उन्होंने प्रार्थना की थी —
वायुदेव ने अंजना देवी का तप देखा। उन्होंने उस चील के मुख से वह दिव्य पायस-अंश अंजना देवी की हथेली में रख दिया। अंजना ने पूरी श्रद्धा से वह पायस ग्रहण किया।
और उनके गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ।
माँ, ध्यान दीजिये — वायुदेव ने हनुमान जी को जन्म नहीं दिया। उन्होंने उस दिव्य अंश को अंजना तक पहुँचाया। इसीलिए हनुमान जी "वायुपुत्र" कहलाते हैं — वायु ने ही उनके जन्म का माध्यम बनाया।
राम जी और हनुमान जी, दोनों एक ही पुत्र-कामेष्टि यज्ञ की पायस से जन्मे हैं। दोनों भगवान विष्णु के अंश हैं।
एक मनुष्य रूप में अयोध्या में राम बने,
एक वानर रूप में पम्पासर में हनुमान बने।
माँ, जब हनुमान जी ने अपना सीना फाड़ कर राम-सीता को अपने हृदय में दिखाया था — वह केवल भक्ति का प्रदर्शन नहीं था। वह रक्त-संबंध का दर्शन था।
राम जी और हनुमान जी
स्वामी और सेवक नहीं हैं —
सगे भाई हैं।
हनुमान जी ने यह सत्य कभी प्रकट नहीं किया। वे चुपचाप राम जी की सेवा करते रहे। यही उनकी सबसे बड़ी विनम्रता है —
यह तुलसीदास जी ने स्पष्ट नहीं कहा। यह "गुप्त-रामायण" का अंश है। जो हनुमान जी ने स्वयं हिमालय की चट्टानों पर अपनी पूँछ की कलम से लिखी थी, और बाद में समुद्र में बहा दी थी — ताकि वाल्मीकि जी की कीर्ति बनी रहे।
जो स्कन्द पुराण (माहेश्वर खण्ड), आनंद रामायण, और वाल्मीकि रामायण के बाल काण्ड सर्ग १६–१७ में सुरक्षित है — वही आज आपके चरणों में रखता हूँ माँ।